May 13, 2021

कोरोना के सामने किसी वारियर से कम नहीं रहीं ये नर्सेस, पढ़िए तीन नर्सों की कहानियां

कोरोना काल (corona/covid-19) में एक तरफ महामारी से सब जूझ रहे हैं तो दूसरी तरफ कोरोना वारियर्स (corona warriors) भी एक के बाद एक कई रूप में सामने आ रहे हैं. कोरोना मरीजों की लाइफ में नर्सों (nurses during corona) की जगह किसी भगवान से कम नहीं हैं. नर्से इस काल में डॉक्टर्स के साथ मिलकर मरीज का काफी ध्यान रख रही हैं. यहाँ तक की ना उनके घर से आने का समय इस दौरान फिक्स है और ना ही वापस घर जाने का. लेकिन इन सब के बावजूद वे अपना पूरा वक्त मरीजों की सेवा के लिए दे रही हैं और एक अनूठी मिसाल पेश कर रही हैं.

नर्स अपने मरीज के लिए किसी मां, बहन या खुद भगवान से कम नहीं हैं. डॉक्टर मरीजों का इलाज करके अपने काम को अंजाम दे रहे हैं. तो वहीँ इसके बाद मरीजों का बाकि का काम जैसे टेम्प्रेचर और ऑक्सीजन चेक करना, मरीजों को दवाई देना, उनके बाकि काम करना सब शामिल हैं.

कई नर्सें जहाँ देश के बड़े शहरों में अपनी सेवा दे रही हैं तो वहीँ कई नर्सें गांवों में भी काम कर रही हैं. ये नर्सें पूरे जोश के साथ अपने घर और बच्चों काे छाेड़कर अपनी सेवाएँ हॉस्पिटल्स में दे रही हैं. आज हम आपको कुछ ऐसी ही नर्सों की अनूठी कहानियां बता रहे हैं जो समाज में एक मिसाल के रूप में सामने आई हैं. (corona warriours nurses stories in hindi)

पहली कहानी की हीरो हैं माया बोरबन :

हम बात कर रहे हैं 31 वर्षीय नर्स माया बाेरबन के बारे में. माया कुछ दिनों पहले ही कोरोना पॉजिटिव पाई गई थीं. यह बीमारी उन्हें कोरोना के संदिग्ध मरीजों का सैंपल लेने के दौरान हुई थी. खुद नर्स होने के चलते उन्हें इस बीमारी की अच्छी समझ थी इसलिए उन्होंने घर पर ही क्वारंटाइन किया और अपना इलाज शुरू किया.

उन्होंने इस दौरान अपने 5 साल के बच्चे को भी खुद से दूर कर दिया और पॉजिटिव विचारों के साथ ही खुद का उपचार किया. माया ने तेजी से इस बीमारी पर फ़तेह हासिल की और फिर से ड्यूटी ज्वाइन की.

माया इस बारे में कहती हैं कि वे सुबह के 9 बजे अपने घर से हॉस्पिटल के लिए निकलती हैं. फिर मध्यभारत अस्पताल में जाती है और यहाँ से उनके सीनियर जिस गाँव में सैंपलिंग के लिए जाने के लिए कहते हैं वहां चली जाती हैं.

जब माया उस गाँव में एंटीजन की टेस्टिंग करती हैं तो कई लोगों की पॉजिटिव रिपोर्ट तो उन्हें उस वक्त ही पता चल जाती है. वे कहती हैं कि जब इस काम की शुरुआत हुई थी तब उन्हें यह काम करने में घबराहट जरुर होती थी, लेकिन बाद में वे यह काम बिना किसी घबराहट के करने लगीं.

माया सुबह 9 बजे से शाम के 6 बजे तक लगातार सैंपल कलेक्ट करने का काम करती हैं. इसके बाद वे घर पहुँचती हैं और फॅमिली से भी कुछ दुरी बनाकर रखती हैं.

दूसरी कहानी है मुमताज बेगम की :

यह कहानी है बेंगलुरू के मनिपाल हॉस्पिटल में काम करने वाली सीनियर नर्स मुमताज़ बेगम की. मुमताज़ बेगम ने भी कोविड-19/कोरोना से संक्रमित होने और उससे ठीक होने के बाद फिर से मरीजों की सेवा करना शुरू की.

इस बारे में बात करते हुए इसी हॉस्पिटल के मुख्य परिचालन अधिकारी दीपक वेणुगोपालन यह बताते हैं कि, मुमताज़ एक एक पेशेवर नर्स हैं और मरीजो के लिए काम करने के दौरान ही उन्हें कोरोना हो गया था. वे कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद भी घबराई नहीं और कोरोना से जंग के लिए तैयार हो गईं.

मुमताज़ बेगम ने हर कदम पर खुद को हौंसला दिया और आखिरकार इस बीमारी को हराया. इस बार में नेफ्रोलॉजिस्ट एस विश्वनाथ का कहना है, मुमताज़ बेगम ने साल 2016 के दौरान रेनल सिस्टम में कुछ प्रोब्लेम के कारण किडनी ट्रांसप्लांट कराया था. इसके बावजूद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और महामरी से खुद को ठीक किया.

मुमताज़ जैसे ही इस बीमारी से उभरी वे तुरंत ही अपने काम पर लौट आई और मरीजों की सेवा में लग गईं.

तीसरी कहानी है प्रफुल्लित पीटर की :

जहां एक तरफ यह देखने को मिल रहा है कि हट्टे-कट्टे लोग भी कोरोना की लपेट में आ रहे हैं और कई तो जिन्दगी भी गंवा रहे हैं. लेकिन ऐसे में एक फेफड़े से इस बीमारी को हराने वाली एक नर्स की कहानी सबका मनोबल बढ़ा रही है. हम बात कर रहे हैं टीकमगढ़ जिले में रहने वाली 39 साल की नर्स प्रफुल्लित पीटर की.

जब प्रफुल्लित पीटर की उम्र महज 3 या 4 साल की थी तब उनके लेफ्ट फेफड़े में चोट लग गई थी, और प्रफुल्लित पीटर की जान बचाने के लिए उनका एक फेफड़ा निकाल भी दिया गया था.

हालाँकि उनके पिता ने उन्हें कभी इस बारे में नहीं बताया क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि प्रफुल्लित पीटर डर जाएँ. शादी के बाद पीटर को इस बारे में पता चला और उन्होंने इसका मजबूती से सामना किया.

कुछ दिनों पहले ही प्रफुल्लित पीटर की बुआ सास को भी कोरोना हुआ और इस कारण उनका निधन भी हो गया. इस दौरान ही प्रफुल्लित पीटर को ही कोरोना ने अपनी चपेट में ले लिया. एक फेफड़ा नहीं होने और कोरोना होने के बाद भी नर्स ने हिम्मत नहीं हारी और कोरोना का हिम्मत के साथ सामना किया.

बीमारी और इससे जूझने के बारे में प्रफुल्लित पीटर कहती हैं कि वे अपने एक फेफड़े को को मजबूत बनाने के लिए रोजाना प्राणायाम करती हैं और गुब्बारे भी फुलाती हैं.

वे कहती हैं कि जब उन्हें जब पहली बात कोरोना वार्ड में जाना पड़ा तो उन्हें काफी डर लग रहा था. लेकिन धीरे धीरे सबके बीच रहते हुए उन्होंने खुद को नार्मल किया और फिर मरीजों की सेवा में लग गईं. जब भी किसी कोरोना मरीज को वार्ड में लाया जाता है तो वे उसके पास जाती हैं और उसका हौंसला बढ़ाती हैं.

वे लोगों को अपने एक फेफड़े के बारे में बताती हैं और इसके बावजूद भी हैप्पी और हेल्थी लाइफ जीने के बारे में बताती हैं जिसे जान लोगों को भी प्रेरणा मिलती है.

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