February 8, 2021

Tarun Sagar Biography – जलेबी खाते-खाते बने जैन मुनि, विशाल डडलानी ने कान पकड़कर मांगी माफी

जैन मुनि तरुण सागर जी ने अपने जीवन काल में देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपने अमूल्य वचनों से लोगों के जीवन को नई दिशा देने का काम किया था। ‘कड़वे प्रवचन’ देने के लिए मशहूर रहे क्रांतिकारी जैन मुनि तरुण सागर जी की ज्ञान की बात लोगों को काफी पसंद आती थी। लोगों को जागरूक करने के लिए उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं। लंबी बीमारी के बाद 1 सितम्बर 2018 को तरुण सागर जी ने अपनी देह त्याग दी थी। आज हम जैन मुनि तरुण सागर के कड़वे प्रवचन और उनके जीवन से जुड़ी रोचक चीजों के बारे में जानेंगे।

जैन मुनि तरुण सागर जी का जीवन परिचय

जैन मुनि तरुण सागर जी का जन्म 26 जून 1967 को मध्य प्रदेश के दमोह में हुआ था। तरुण सागर जी के पिता का नाम प्रताप चंद्र था। तरुण सागर जी की माता का नाम शांतिबाई था। तरुण सागर जी के गुरु का नाम आचार्य पुष्पदंत सागर जी था। तरुण सागर जी का झुकाव बचपन से ही आध्यात्म की तरफ था। यहीं कारण है कि उन्होंने 8 मार्च 1981 को महज 13 साल की उम्र में गृह त्याग दिया था। तरुण सागर जी ने छत्तीसगढ़ में दीक्षा ली थी। उन्होंने 18 जनवरी 1982 को छत्तीसगढ़ के अकलतरा में दीक्षा लेना शुरू किया और 20 जुलाई 1988 को राजस्थान के बागीदौरा में उन्हें जैन मुनि की दीक्षा के साथ महाराज और जैन मुनि की उपाधि दी गई।

जैन मुनि बनने के बाद तरुण सागर जी ने पूरे देश का भ्रमण किया। अन्य जैन मुनियों से अलग तरुण सागर जी क्रांतिकारी प्रवचन के लिए लोगों के बीच पहचाने जाने लगे। वह अकसर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते थे। उन्होंने अपने प्रवचनों के जरिए भ्रष्टाचार, हिंसा और रुढ़िवाद का जोरदार विरोध किया। यहीं कारण है कि तरुण सागर जी के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोग भी पहुंचने लगे। तरुण सागर जी के प्रवचन देने के तरीके के कारण ही लोग इन्हें क्रांतिकारी जैन संत मानने लगे। देश-दुनिया में इनके करोड़ो अनुयायी हो गए। तरुण सागर जी ने साल 2010 में मध्यप्रदेश विधानसभा को संबोधित किया था। इसके अलावा 2016 में उन्होंने हरियाणा विधानसभा में भी प्रवचन दिया था। 1 सितम्बर 2018 को लंबी बीमारी के बाद तरुण सागर जी ने अपनी देह का त्याग कर दिया।

जलेबी खाते-खाते बन गए जैन मुनि

तरुण सागर जी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें पहली बार संन्यासी बनने का ख्याल जलेबी खाते-खाते आया था। स्वयं तरुण सागर जी ने एक बार यह किस्सा सुनाते हुए कहा था कि, ‘एक दिन मैं स्कूल से घर जा रहा था। इस दौरान रास्ते में मैं जलेबी खाने के लिए रुका। जलेबी खाते-खाते मुझे पास में चल रहे आचार्य पुष्पधनसागरजी महाराज का प्रवचन सुनाई दिया। वह कह रहे थे कि तुम भी भगवान बन सकते हो। जब मैंने यह बात सुनी तो मैंने संत परंपरा अपना ली।’

विशाल डडलानी ने कान पकड़कर मांगी माफी

हरियाणा सरकार के द्वारा न्योता मिलने पर तरुण सागर जी ने 26 अगस्त 2016 को हरियाणा विधानसभा को संबोधित किया। इसका विरोध करते हुए विशाल डडलानी ने ट्विटर पर लिखा कि, ‘अगर आपने इन लोगों के लिए वोट दिया है तो आप आप इस बकवास के लिए जिम्मेदार हो। नो अच्छे दिन जस्ट नो कच्छे दिन।‘ इस ट्वीट के कारण विशाल डडलानी को काफी विरोध का सामना करना पड़ा। देशभर में उनका काफी विरोध हुआ। इसके बाद विशाल डडलानी ने तरुण सागर जी से कान पकड़कर माफ़ी मांगी।

तरुण सागर जी कड़वे प्रवचन

तुम्हारी वजह से जीते जी किसी की आंखों में आंसू आए तो यह सबसे बड़ा पाप है। लोग मरने के बाद तुम्हारे लिए रोए, यह सबसे बड़ा पुण्य है। इसीलिए जिंदगी में ऐसे काम करो कि, मरने के बाद तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए किसी और को प्रार्थना नहीं करनी पड़े। क्योंकि दूसरों के द्वारा की गई प्रार्थना किसी काम की नहीं है।

जिंदा आदमी ही मुस्कुराएगा, मुर्दा कभी नहीं मुस्कुराता और कुत्ता चाहे तो भी मुस्कुरा नहीं सकता, हंसना तो सिर्फ मनुष्य के भाग्य में ही है। इसीलिए जीवन में सुख आए तो हंस लेना, लेकिन दुख आए तो हंसी में उड़ा देना।

एक आदमी ने ईश्वर से पूछा- आपके प्रेम और मानवीय प्रेम में क्या अंतर है? ईश्वर ने कहा- आसमान में उड़ता पंछी मेरा प्रेम है और पिंजरे में कैद पंछी मानवीय प्रेम है।

जीवन परिवर्तन के लिए सुनने की आदत डालो। सुनना भी एक साधना है। चिंतन बदलो तो सबकुछ बदल जाएगा। इससे रंग नहीं, तो कम से कम जीने का ढंग तो बदल ही सकता है।

परिवार के किसी सदस्य को तुम नहीं बदल सकते। तुम अपने आपको बदल सकते हो, यह तुम्हारा जन्मसिद्घ अधिकार भी है। पूरी दुनिया को चमड़े से ढंकना तुम्हारे बस की बात नहीं है। अपने पैरों में जूते पहन लो और निकल पड़ों फिर पूरी दुनिया तुम्हारे लिए चमड़े से ढंकी जैसी ही होगी।

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