‘मां’ यह मात्र एक शब्द नहीं बल्कि अपने आप में पूरा महाकाव्य है। कहते है भगवान धरती पर सब जगह नहीं हो सकता, इसलिए उसने मां को बनाया। मां ही वह शख्स है जब बेटे को जरा सी चोंट लग जाए तो उसका दिल तड़प उठता है। मां ही वह शख्स है जो अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती है। आज हम आपको एक ऐसी ही मां की सच्ची कहानी बताने जा रहे हैं जिसने अपने भूख से रो रहे बच्चों को खाना खिलाने के लिए अपने सिर के बाल मुंडवा दिए। मां ने अपने बालों को 150 रुपए में बेच दिया और उससे अपने बच्चों के लिए खाने का प्रबंध किया।
हम बात कर रहे हैं तमिलनाडु के सेलम ज़िले में रहने वाली 31 साल की प्रेमा सेल्वम की। प्रेमा के तीन बच्चे है। कुछ दिनों पहले की बात है, एक दिन प्रेमा के सात साल के बच्चे ने स्कूल से आकर खाना माँगा, लेकिन घर पर खाने के लिए कुछ नहीं था। कुछ देर तक खाना नहीं मिला तो बच्चा रोने लगा। प्रेमा अपने आप को असहाय महसूस करने लगी। उसके पास ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिसे बेचकर वह बच्चों को खाना खिला सके। ना तो उसके पास गहने थे और ना ही घर के किचन में ऐसा कोई सामान था, जिसे वह बेच सके। प्रेमा के पास बच्चों के खाने का प्रबंध करने के लिए 10 रुपए भी नहीं थे।
150 रुपए में बेचे बाल
बच्चों को भूख से रोते देख दुखी प्रेमा को एक ऐसी दूकान का ख्याल आया, जहां बाल ख़रीदे जाते हैं। ऐसे में प्रेमा उस दुकान पर गई और 150 रुपए में अपने बाल बेच दिए। 150 रुपए मिलने के बाद प्रेमा अपने बच्चों के साथ एक दुकान पर गई और 20 रुपए प्लेट के हिसाब से तीन प्लेट चावल ख़रीदे। इसके बाद प्रेमा और उसके बच्चों ने चावल खाकर अपनी भूख मिटाई। बता दे कि दुनिया में इंसानों के बालों का बड़ा कारोबार है और भारत इसका प्रमुख निर्यातक है।
आत्महत्या की कोशिश
बाल बेचकर प्रेमा ने उस दिन तो अपने बच्चों की भूख मिटा दी, लेकिन उसे आने वाले समय की चिंता सता रही थी। उसे पता था कि वह बचे हुए पैसों से एक-दो दिन ही अपने बच्चों को खाना खिला सकेगी। उसके बाद क्या होगा? यह चिंता उसे सताए जा रही थी। कोई रास्ता ना मिलते देख उसने अपने बच्चों के साथ आत्महत्या करने की सोची। यह सोच प्रेमा एक दुकान पर कीटनाशक खरीदने गई, लेकिन दुकानदार को शायद उसके इरादों के बारे में पता चल गया और उसने उसे भगा दिया। इसके बाद प्रेमा अपने घर लौटी और जहरीली झाड़ी कनेर के बीज लेकर उसको पीसना शुरु किया। ठीक उसी समय प्रेमा की बहन उसके घर आ गई और अपनी प्रेमा को जहरीला पेस्ट बनाने से रोका।
सात महीने पहले पति ने की आत्महत्या
बता दे कि प्रेमा और उसका पति ईटों के भट्टों पर काम करते थे। इससे जैसे-तैसे परिवार का गुजारा हो जाता था। इस बीच प्रेमा के पति ने अपना भट्टा चलाने के लिए ब्याज दर पर स्थानीय महाजन और पड़ोसियों से क़र्ज़ लिया था। लेकिन वह अपना भट्टा चला नहीं पाए और कर्ज के दलदल में फंस गए। प्रेमा और उसके पति की आमदनी इतनी नहीं थी कि वह अपना कर्ज चुका पाए। कर्ज से घिरे होने के कारण प्रेमा के पति ने सात महीने पहले आत्महत्या कर ली और अपने पीछे छोड़ गए पत्नी और तीन बच्चों को।
बीमार होने से आमदनी हुई खत्म
पति की मौत के बाद भी प्रेमा ने अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मजदूरी जारी रखी। वह ईटों के भट्टों पर ही काम करती थी। ईटों के भट्टों पर मेहनत ज्यादा लगती थी, लेकिन उसे इसके बदले रोजाना 200 मिल जाते थे, जिससे वह जैसे-तैसे अपने बच्चों को पालती और कर्ज की किस्ते चुकाती। लेकिन पिछले तीन महीनों से प्रेमा बीमार रहने लगीं। बुख़ार के चलते प्रेमा ईंटों का बोझ उठा नहीं पा रही थी। काम पर नहीं जाने के चलते उनकी आमदनी कम हो गई थी। पढ़ी लिखी नहीं होने के कारण उसे सरकारी योजनाओं के बारे में भी जानकारी नहीं थी। ऊपर से आमदनी कम होने से वह कर्जों की क़िस्त भी नहीं चुका पा रही थी।

बाला मुरुगन ने की मदद
प्रेमा की इस कहानी के बारे में जब कंप्यूटर ग्राफिक्स सेंटर चलाने वाले बाला मुरुगन को पता चला तो वह प्रेमा से मिलने के लिए पहुंचे। उन्होंने प्रेमा से उनके हालात समझे और उसे मदद का भरोसा दिलाया। दूसरी तरफ प्रेमा के दोस्त प्रभु ने प्रेमा को कुछ पैसे दिए ताकि वह कुछ दिन अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके। इसके बाद बाला ने सोशल मीडिया के जरिए लोगों से प्रेमा को मदद करने की अपील की। बाला की अपील का असर हुआ और महज एक दिन में ही लोगों ने एक लाख बीस हज़ार रुपये प्रेमा की मदद के नाम पर बाला को दिए। जब बाला ने वह पैसे प्रेमा को दिए तो बहुत खुश हुई और कहा कि इससे उसे कर्ज चुकाने में बहुत मदद मिलेगी। इसके बाद प्रेमा ने बाला को और मदद जुटाने से मना कर दिया। उसने कहा कि अब बाकि कर्ज वह खुद मेहनत करके चुका देगी। प्रेमा को अब बाक़ी क़र्जे़ के लिए सात सौ रुपये महीने के हिसाब से कर्ज लौटाना है। दूसरी तरफ मामला सुर्ख़ियों में आया तो जिला प्रशासन भी प्रेमा की मदद के लिए आगे आया और मदद के लिए दूध बेचने की डीलरशिप की व्यवस्था करने का भरोसा दिलाया है।
बाला का परिवार भी गुजर चुका है इन मुश्किलों से
दरअसल बाला का परिवार भी ऐसी परिस्थितियों का सामना कर चुका है। जब बाला 10 साल के थे तब उनकी मां घर की पुरानी किताब, काग़ज की रद्दियां बेच कर उनके लिए चावल खरीदकर लाई थी। एक बार आर्थिक तंगी से परेशान होकर बाला की मां ने भी अपने परिवार सहित आत्महत्या की कोशिश भी की थी। यहीं कारण है कि बाला को जब प्रेमा के बारे में पता चला तो वह तुरंत उसकी मदद करने के लिए पहुँच गए।
प्रेमा को मिला नया जीवन
प्रेमा को मिली मदद के बाद उसके जीवन सुखद बदलाव आया है। प्रेमा अब अपने आत्महत्या का कदम उठाने के फैसले को गलत बताती है। उसका कहना है कि अब वह मेहनत करके अपना कर्ज चुका देगी। प्रेमा बताती हैं कि अजनबियों से मिलने वाली मदद से वह बेहद खुश हैं।
